Tuesday, 30 June 2015
Monday, 29 June 2015
चुचों डालियों ना काटा.
ना काटाहाआहाआआआआहा तौ डालियोंयोंयों...
डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा दिदों डालियों ना काटा
डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा दिदों डालियों ना काटा
ना काटाहाआहाआआआआहा तौ डालियों....२
डालि कटेलि त माटी बगाली
डालि कटेलि त माटी बगाली
कुडी ना फुन्ग्डी ना डोखरी बचली
कुडी ना फुन्ग्डी ना डोखरी बचली
घास लखडा न खेती हि रलि
घास लखडा न खेती हि रलि
भोल तेरी आश औलाद क्या खाली....२
डालि कटेलि त माटी बगाली
डालि कटेलि त माटी बगाली
कुडी ना फुन्ग्डी ना डोखरी बचली
कुडी ना फुन्ग्डी ना डोखरी बचली
घास लखडा न खेती हि रलि
घास लखडा न खेती हि रलि
भोल तेरी आश औलाद क्या खाली....२
ना काटाआआआहाहाहाआआआआ तौ डालियों
डालियों ना काटा दीदीयों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा भूलियों डालियों ना काटा...२
धारा मन्ध्यरा पंन्धेरा सुकला
धारा मन्ध्यरा पन्धेरा सुकला ना नोला भरेला ना छुय्या फुटला
हरचलु गाड गदनियूं कु पाणि
हरचलु गाड गदनियूं कु पाणि
तीसल गोली ऊबाली क्या कल्या
ना काटाहाहाहाआआआआहा तौ डालियों
डालियों ना काटा दिदों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा भूलों डालियों ना काटा.....२
गोडी भेंसियों कु बाखरियों कु चारु
गोडी भेंसियों कु बाखरियों कु चारु
झपन्यालि डाली चखुल्यों कु सारु
झ्पन्यालि डाली चखुल्यों कु सारु
फूल खिलाला ना हेरियालि रली
फूल खिलाला ना हेरियालि रली
दुनियाँ यों पहाडों कु ठठाठा लगाली
दुनियाँ यों पहाडो कु ठठाठा लगाली
ना काटाहाहाहाहाआआआआहाहाहा तौ डालियों
डालियों ना काटा दिदों डालियों ना काटा
तौ डालियों भुलौं डालियों ना काटा
डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा..,२
सेंता यों डालियों ते नौनियाल जाणि
सेंता यों डालियों ते नौनियाल जाणि
पाला यों डलियों ते औलाद माणि
औलाद भोलक रूठी भी जाली
औलाद भोलक रूठी भी जाली
नाजल पाणि या डाली हि ल्यालि
नाजल पाणि या डाली हि ल्यालि
ना काटाहाहाहाहाआआआआहाहाहाहा तौ डालियों
डालियों ना काटा दीदीयों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा भूलियों डालियों ना काटा
डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा.
डालियों ना काटा दीदीयों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा भूलियों डालियों ना काटा...२
धारा मन्ध्यरा पंन्धेरा सुकला
धारा मन्ध्यरा पन्धेरा सुकला ना नोला भरेला ना छुय्या फुटला
हरचलु गाड गदनियूं कु पाणि
हरचलु गाड गदनियूं कु पाणि
तीसल गोली ऊबाली क्या कल्या
ना काटाहाहाहाआआआआहा तौ डालियों
डालियों ना काटा दिदों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा भूलों डालियों ना काटा.....२
गोडी भेंसियों कु बाखरियों कु चारु
गोडी भेंसियों कु बाखरियों कु चारु
झपन्यालि डाली चखुल्यों कु सारु
झ्पन्यालि डाली चखुल्यों कु सारु
फूल खिलाला ना हेरियालि रली
फूल खिलाला ना हेरियालि रली
दुनियाँ यों पहाडों कु ठठाठा लगाली
दुनियाँ यों पहाडो कु ठठाठा लगाली
ना काटाहाहाहाहाआआआआहाहाहा तौ डालियों
डालियों ना काटा दिदों डालियों ना काटा
तौ डालियों भुलौं डालियों ना काटा
डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा..,२
सेंता यों डालियों ते नौनियाल जाणि
सेंता यों डालियों ते नौनियाल जाणि
पाला यों डलियों ते औलाद माणि
औलाद भोलक रूठी भी जाली
औलाद भोलक रूठी भी जाली
नाजल पाणि या डाली हि ल्यालि
नाजल पाणि या डाली हि ल्यालि
ना काटाहाहाहाहाआआआआहाहाहाहा तौ डालियों
डालियों ना काटा दीदीयों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा भूलियों डालियों ना काटा
डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा
तौ डालियों ना काटा चुचों डालियों ना काटा.
Sunday, 28 June 2015
आज वो देखी गाडी मा
आज वो देखी गाडी मा
भली सजी छै साडी मा
आज वो देखी गाडी मा
भली सजी छै साडी मा
भली सजी छै साडी मा
आज वो देखी गाडी मा
भली सजी छै साडी मा
देखी छै च कख देखी होली देखी छै च
देखी छै च कख देखी होली
सेद पौखडा गवाणी मा
झल मुखडी वींकी दिख्याई
शर्म्यली वो शर्मे ग्याई
शर्म्यली वो शर्मे ग्याई
सुपन्यु रे होलु की भेम
मन मेरु वो भर्मे ग्याई
अब सोच्यू मा डुब्यूं छौ.
धेरी की हथ गल्वीडा मा
आज वो देखी गाडी मा
भली सजी छै साडी मा
पैली भी देखी छै वो बांद
दुनिया से जो नारी चा
दुनिया से जो नारी चा
मेरा मन मा वी च बस
वो मेरा हिया की प्यारी चा
खिल्यूं खिल्यूं तन बदन खिल्यूं खिल्यूं
खिल्यूं खिल्यूं तन बदन
फूल बुरोंसी डाली मा
आज वो देखी गाडी मा
भली सजी छै साडी मा
देखी छै च कख देखी होली
सेद पौखडा गवाणी मा
झल मुखडी वींकी दिख्याई
शर्म्यली वो शर्मे ग्याई
शर्म्यली वो शर्मे ग्याई
सुपन्यु रे होलु की भेम
मन मेरु वो भर्मे ग्याई
अब सोच्यू मा डुब्यूं छौ.
धेरी की हथ गल्वीडा मा
आज वो देखी गाडी मा
भली सजी छै साडी मा
पैली भी देखी छै वो बांद
दुनिया से जो नारी चा
दुनिया से जो नारी चा
मेरा मन मा वी च बस
वो मेरा हिया की प्यारी चा
खिल्यूं खिल्यूं तन बदन खिल्यूं खिल्यूं
खिल्यूं खिल्यूं तन बदन
फूल बुरोंसी डाली मा
आज वो देखी गाडी मा
भली सजी छै साडी मा
बैजनाथ मन्दिर कौसानी उत्तराखंण्ड
बैजनाथ मन्दिर कौसानी उत्तराखंण्ड।
उत्तराखण्ड का कश्मीर कहे जाने वाले सुन्दर मनमोहक पर्यटक स्थल कौसानी में बैजनाथ मन्दिर परिसर स्थित है।यह मन्दिर परिसर बागेश्वर जिले के गरूड़ तहसील में पड़ता है। और गरूड़ से 2 किलो मीटर की दूरी पर गोमती नदी के किनारे पर स्थित है। यह मन्दिर परिसर 1000 साल से भी कही ज्यादा पुराना है।लगता तो नही है।पर कहते है।कि यह मन्दिर सिर्फ एक रात में ही बनाया गया था।यहाँ पर माता पार्वती जी की एक,आदम कद मुर्ती है।उसी के आगे शिव लिगं की स्थापना की हुई है।
बैजनाथ उत्तराखंण्ड का काफी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है।कौसानी से महज 17 किलो मीटर की दूरी पर स्थित बैजनाथ गोमती नदी के तट पर स्थित है। पर्यटकों के लिए यहां का सर्वाधिक अकर्षक के केन्द्र 12 वी सदी में निर्मित शिव, गणेश, पार्वती,चडिका,कुबेर,सूर्य मन्दिर है।
उत्तराखण्ड का कश्मीर कहे जाने वाले सुन्दर मनमोहक पर्यटक स्थल कौसानी में बैजनाथ मन्दिर परिसर स्थित है।यह मन्दिर परिसर बागेश्वर जिले के गरूड़ तहसील में पड़ता है। और गरूड़ से 2 किलो मीटर की दूरी पर गोमती नदी के किनारे पर स्थित है। यह मन्दिर परिसर 1000 साल से भी कही ज्यादा पुराना है।लगता तो नही है।पर कहते है।कि यह मन्दिर सिर्फ एक रात में ही बनाया गया था।यहाँ पर माता पार्वती जी की एक,आदम कद मुर्ती है।उसी के आगे शिव लिगं की स्थापना की हुई है।
बैजनाथ उत्तराखंण्ड का काफी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है।कौसानी से महज 17 किलो मीटर की दूरी पर स्थित बैजनाथ गोमती नदी के तट पर स्थित है। पर्यटकों के लिए यहां का सर्वाधिक अकर्षक के केन्द्र 12 वी सदी में निर्मित शिव, गणेश, पार्वती,चडिका,कुबेर,सूर्य मन्दिर है।
धारी देवी मंदिर
गढ़वाल की सिद्धिदात्री माँ धारी देवी
एक 20 मीटर ऊंची चट्टान के ऊपर स्थित , धारी देवी का मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे पर स्थित है. श्रीनगर – बद्रीनाथ राजमार्ग पर श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) से 19 किलोमीटर की दूरी की यात्रा पर कालिया सव्ध नामक स्थान तक फिर अलकनंदा नदी की दिशा में एक किलोमीटर नीचे यह मंदिर स्थित है .एक स्थानीय कहानी अनुसार, मंदिर एक बार बाढ़ में बह गया था, तैरते हुई मूर्ति एक चट्टान पे रुक गई , ग्रामीणों ने मूर्ति को पुकारता हुआ सुना. स्थान पर पहुँचने पर उनहोंने एक दिव्य आवाज सुनी जिसने उन्हें निर्देश दिए की जिस स्थान पे मूर्ती है वहीँ पे उसे स्थापित किया जाए. तब से माता के भयंकर रूप की यह मूर्ति यहाँ स्थापित है , जिन्हें धारी देवी के रूप में जाना जाता है , खुले आकश के निचे यहाँ हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन हेतु आते हैं. बद्रीनाथ जाते हुए भक्त यहाँ माता के दर्शन करना नहीं भूलते. श्रीनगर में स्थित इस धारी देवी मंदिर में माता का केवल सर स्थापित है , बाकी शरीर रुद्रप्रयाग जिले के कालीमठ में माना जाता है
यह माना जाता है कि धारी देवी की मूर्ति को छत के नीचे नहीं रखा जाएगा. उसी कारण से, धारी देवी मंदिर में मूर्तियों खुले आसमान के नीचे स्थापित हैं.
एक 20 मीटर ऊंची चट्टान के ऊपर स्थित , धारी देवी का मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे पर स्थित है. श्रीनगर – बद्रीनाथ राजमार्ग पर श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) से 19 किलोमीटर की दूरी की यात्रा पर कालिया सव्ध नामक स्थान तक फिर अलकनंदा नदी की दिशा में एक किलोमीटर नीचे यह मंदिर स्थित है .एक स्थानीय कहानी अनुसार, मंदिर एक बार बाढ़ में बह गया था, तैरते हुई मूर्ति एक चट्टान पे रुक गई , ग्रामीणों ने मूर्ति को पुकारता हुआ सुना. स्थान पर पहुँचने पर उनहोंने एक दिव्य आवाज सुनी जिसने उन्हें निर्देश दिए की जिस स्थान पे मूर्ती है वहीँ पे उसे स्थापित किया जाए. तब से माता के भयंकर रूप की यह मूर्ति यहाँ स्थापित है , जिन्हें धारी देवी के रूप में जाना जाता है , खुले आकश के निचे यहाँ हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन हेतु आते हैं. बद्रीनाथ जाते हुए भक्त यहाँ माता के दर्शन करना नहीं भूलते. श्रीनगर में स्थित इस धारी देवी मंदिर में माता का केवल सर स्थापित है , बाकी शरीर रुद्रप्रयाग जिले के कालीमठ में माना जाता है
यह माना जाता है कि धारी देवी की मूर्ति को छत के नीचे नहीं रखा जाएगा. उसी कारण से, धारी देवी मंदिर में मूर्तियों खुले आसमान के नीचे स्थापित हैं.
Saturday, 27 June 2015
सुरकंडा मंदिर
सुरकंडा मंदिर उत्तराखण्ड
कहा जाता है कि जब राजा दक्ष प्रजापति ने हरिद्वार में यज्ञ किया तो पुत्री सती व उनके पति शंकर को आमंत्रित नहीं किया। इस अपमान से क्षुब्ध सती ने यज्ञ कुण्ड में प्राणों की आहुति दे दी। पत्नी वियोग में व्याकुल व क्रोधित भगवान शंकर सती के शव को लेकर हिमालय की ओर चल दिए। इस दौरान भगवान विष्णु ने महादेव का बोझ कम करने के लिए सुदर्शन चक्र को भेजा। इस दौरान सती के शरीर के अंग भिन्न जगहों पर गिरे। माना जाता है कि इस दौरान सुरकुट पर्वत पर सती का सिर गिरा तभी से इस स्थान का नाम सुरकंडा पड़ा।
चम्बा प्रखंड का जड़धारगांव देवी का मायका माना जाता है। यहां के लोग विभिन्न अवसरों पर देवी की आराधना करते हैं। मंदिर की समस्त व्यवस्था वही करते हैं। पूजा-अर्चना का काम पुजाल्डी गांव के लेखवार जाति के लोग करते है। मंदिर के पुजारी रमेश प्रसाद लेखवार का कहना है कि सिद्धपीठों में मां सुरकंडा का महातम्य सबसे अलग है। देवी सुरकंडा सभी कष्टों व दुखों को हरने वाली हैं।
कहा जाता है कि जब राजा दक्ष प्रजापति ने हरिद्वार में यज्ञ किया तो पुत्री सती व उनके पति शंकर को आमंत्रित नहीं किया। इस अपमान से क्षुब्ध सती ने यज्ञ कुण्ड में प्राणों की आहुति दे दी। पत्नी वियोग में व्याकुल व क्रोधित भगवान शंकर सती के शव को लेकर हिमालय की ओर चल दिए। इस दौरान भगवान विष्णु ने महादेव का बोझ कम करने के लिए सुदर्शन चक्र को भेजा। इस दौरान सती के शरीर के अंग भिन्न जगहों पर गिरे। माना जाता है कि इस दौरान सुरकुट पर्वत पर सती का सिर गिरा तभी से इस स्थान का नाम सुरकंडा पड़ा।
चम्बा प्रखंड का जड़धारगांव देवी का मायका माना जाता है। यहां के लोग विभिन्न अवसरों पर देवी की आराधना करते हैं। मंदिर की समस्त व्यवस्था वही करते हैं। पूजा-अर्चना का काम पुजाल्डी गांव के लेखवार जाति के लोग करते है। मंदिर के पुजारी रमेश प्रसाद लेखवार का कहना है कि सिद्धपीठों में मां सुरकंडा का महातम्य सबसे अलग है। देवी सुरकंडा सभी कष्टों व दुखों को हरने वाली हैं।
राज्य पुष्प ब्रह्मकमल
राज्य पुष्प ब्रह्मकमल उत्तराखण्ड
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाना वाला राज्य पुष्प ब्रह्मकमल विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। सावन के महीने में बड़ी संख्या में पैदा होने वाला यह पुष्प अब धीरे-धीरे कम दिखाई दे रहा है। राज्य पुष्प के साथ ही यह भोले बाबा के भक्तों में बड़ी श्रद्धा भक्ति से देखा जाता है। वहीं वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा का असर भी इस पुष्प पर इस घाटी में देखा जा रहा है।
समुद्र तल से दस हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर पाया जाना वाला राज्य पुष्प केदारपुरी के आस-पास काफी कम संख्या में मिल पाता है। प्रत्येक वर्ष यह पुष्प सावन के महीने में उगता है और अगस्त महीने तक पाया जाता है। आपदा से पूर्व केदारनाथ मंदिर से ऊपर बासुकीताल, समेत ऊचाई वाले स्थानों पर बड़ी संख्या में यह देखा जाता था। वहीं चमोली में फूलों की घाटी में भी यह काफी दिखाई देता है।
श्रवन में भोले के भक्त इस पुष्प को शिव भगवान पर चढ़ाते हैं। माना जाता है कि इसके चढ़ावे से भोले बाबा अपने भक्तों पर काफी प्रसन्न होते हैं और उनकी मनोकामना पूरी करते हैं। हालांकि लगातार मौसम में आ रहे परिवर्तन का असर भी इस पुष्प पर पड़ रहा है। एक दशक पूर्व केदारपुरी में यह पुष्प आम भक्त चढ़ावे के लिए लाते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे यह विलुप्ति की ओर बढ़ रहा है।
केदारनाथ में भी मौसम में आ रहे बदलाव का असर इस पर पड़ रहा है। वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा से भी इस पुष्प को इस घाटी में काफी नुकसान पहुंचा है। चारो ओर ऊबड़ खाबड़ व मलबा होने से यह नहीं उग रहा है। धार्मिक महत्व के साथ ही ब्रह्मकमल औषधीय पौधे के रुप में भी बहुत उपयोगी है। खासी, जुकाम, जोड़ों के दर्द समेत कई अन्य प्रकार बीमारियों के लिए यह बहुउपयोगी है। इस पुष्प की खास बात यह है कि यह पत्थरों एवं चट्टानों पर उगता है। ऐसे में इस पुष्प के संरक्षण के लिए सरकार की ओर से पहल की जरूरत है।
Friday, 26 June 2015
Thursday, 25 June 2015
माँ चंडी देवी उत्तराखण्ड
माँ चंडी देवी उत्तराखण्ड
धार्मिक मान्यता है कि जहां मंसादेवी होंगी, वहां चंडी देवी का होना अनिवार्य है। पौराणिक कथाओं के अनुसार तंत्र-मंत्र की सिद्धिरात्री चंडीदेवी ने इसी स्थान पर शुंभ-निशुंभ नामक असुरों का वध किया था। शिवालिक पर्वत श्रृंखला पर स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर के पास शुंभ और निशुंभ नाम के दो पर्वत आज भी हैं। मंदिर में मां काली की प्रतिमा विराजमान है। इसके पास ही हनुमान जी की माता अंजनी देवी का मंदिर भी स्थित है। मां चंडी देवी की रात में विशेष पूजा होती है। भक्तगण अपनी खास पूजा के लिए मंदिर समिति से संपर्क इस खास अनुष्ठान को अपने तथा अपने परिवार के लिए भी करा सकते हैं। नवरात्रों में इस विशेष पूजा का खास महत्व है। इसके मद्देनजर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। विशेष पूजा करने वालों की संख्या ज्यादा होती है। मान-मनौती के लिए मंदिर की बड़ी आस्था है।
मंदिर में मां की चुनरी को बांध मनौती मांगने की परंपरा है। इसकी बड़ी मान्यता है। चुनरी बांध कर मन की इच्छा पूर्ति की देवी से प्रार्थना करने पर वो अवश्य पूरी होती है। मनौती पूरी होने पर देवी दर्शन तत्पश्चात चुनरी खोलने की भी परंपरा है। नवरात्रों में इसका विशेष महत्व है।
धार्मिक मान्यता है कि जहां मंसादेवी होंगी, वहां चंडी देवी का होना अनिवार्य है। पौराणिक कथाओं के अनुसार तंत्र-मंत्र की सिद्धिरात्री चंडीदेवी ने इसी स्थान पर शुंभ-निशुंभ नामक असुरों का वध किया था। शिवालिक पर्वत श्रृंखला पर स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर के पास शुंभ और निशुंभ नाम के दो पर्वत आज भी हैं। मंदिर में मां काली की प्रतिमा विराजमान है। इसके पास ही हनुमान जी की माता अंजनी देवी का मंदिर भी स्थित है। मां चंडी देवी की रात में विशेष पूजा होती है। भक्तगण अपनी खास पूजा के लिए मंदिर समिति से संपर्क इस खास अनुष्ठान को अपने तथा अपने परिवार के लिए भी करा सकते हैं। नवरात्रों में इस विशेष पूजा का खास महत्व है। इसके मद्देनजर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। विशेष पूजा करने वालों की संख्या ज्यादा होती है। मान-मनौती के लिए मंदिर की बड़ी आस्था है।
मंदिर में मां की चुनरी को बांध मनौती मांगने की परंपरा है। इसकी बड़ी मान्यता है। चुनरी बांध कर मन की इच्छा पूर्ति की देवी से प्रार्थना करने पर वो अवश्य पूरी होती है। मनौती पूरी होने पर देवी दर्शन तत्पश्चात चुनरी खोलने की भी परंपरा है। नवरात्रों में इसका विशेष महत्व है।
उत्तराखंड में मानसून ने दस्तक दे दी
आखिरकार उत्तराखंड में मानसून ने दस्तक दे दी
उधर, मंगलवार देर रात ढाई बजे उत्तराकाशी में भूंकप का झटका महसूस किया गया। जिसकी तीव्रता तीन रिक्टर मापी गई।
दो साल पहले केदारनाथ में आपदा इन्हीं दिनों मौसम विभाग के अलर्ट के बीच आई थी। अब फिर बुधवार से भारी बारिश के आसार बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने अलर्ट जारी कर दिया है।
मौसम विभाग की चेतावनी के बाद सरकार ने सभी जिलों को चौकन्ना रहने को कह तो दिया है लेकिन उसका चार धाम यात्रा का मोह नहीं छूट पा रहा है। जिलाधिकारियों से कहा गया है कि यात्रा बाधित न हो जबकि भारी बरसात में सबसे अधिक परेशानी यात्रियों को ही होने की आशंका है।
यात्रियों को रोकने की मंशा फिलहाल जाहिर नहीं की जा रही है। मौसम विभाग ने यात्रियों को बरसात और तापमान कम होने पर एहतिहात बरतने का सुझाव दिया है।
मौसम विभाग ने अलर्ट जारी कर 24 से 26 जून तक अधिकतर स्थानों पर भारी बारिश की संभावना जताई है। अलर्ट मिलते ही सरकार भी हरकत में आई। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सभी जिलाधिकारियों को सचेत रहने के निर्देश जारी किए।
चार धाम यात्रा मार्ग पर संवेदनशील स्थानों पर खास निगाह रखने को कहा गया। जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन इकाइयों को विशेष रूप से सतर्क रहने को कहा गया है। मुख्य सचिव एन रविशंकर ने एसडीआरएफ सहित संबंधित विभागों से बातचीत की।
उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और पिथौरागढ़ के जिलाधिकारियों को विशेष रूप से सतर्क रहने को कहा गया है। मुख्य सचिव एन रविशंकर ने भी शासन स्तर पर अधिकारियों की बैठक ली और जिलाधिकारियों से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बात की। मुख्य सचिव ने तैयारी का भी जायजा लिया।
उत्तराखंड में मानसून ने दस्तक दे दी है। राज्य मौसम विभाग ने उत्तराखंड में मानसून की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही मौसम विभाग राज्य में दो दिन भारी बारिश की चेतावनी भी दी है।
उधर, मंगलवार देर रात ढाई बजे उत्तराकाशी में भूंकप का झटका महसूस किया गया। जिसकी तीव्रता तीन रिक्टर मापी गई।
दो साल पहले केदारनाथ में आपदा इन्हीं दिनों मौसम विभाग के अलर्ट के बीच आई थी। अब फिर बुधवार से भारी बारिश के आसार बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने अलर्ट जारी कर दिया है।
मौसम विभाग की चेतावनी के बाद सरकार ने सभी जिलों को चौकन्ना रहने को कह तो दिया है लेकिन उसका चार धाम यात्रा का मोह नहीं छूट पा रहा है। जिलाधिकारियों से कहा गया है कि यात्रा बाधित न हो जबकि भारी बरसात में सबसे अधिक परेशानी यात्रियों को ही होने की आशंका है।
यात्रियों को रोकने की मंशा फिलहाल जाहिर नहीं की जा रही है। मौसम विभाग ने यात्रियों को बरसात और तापमान कम होने पर एहतिहात बरतने का सुझाव दिया है।
मौसम विभाग ने अलर्ट जारी कर 24 से 26 जून तक अधिकतर स्थानों पर भारी बारिश की संभावना जताई है। अलर्ट मिलते ही सरकार भी हरकत में आई। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सभी जिलाधिकारियों को सचेत रहने के निर्देश जारी किए।
चार धाम यात्रा मार्ग पर संवेदनशील स्थानों पर खास निगाह रखने को कहा गया। जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन इकाइयों को विशेष रूप से सतर्क रहने को कहा गया है। मुख्य सचिव एन रविशंकर ने एसडीआरएफ सहित संबंधित विभागों से बातचीत की।
उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और पिथौरागढ़ के जिलाधिकारियों को विशेष रूप से सतर्क रहने को कहा गया है। मुख्य सचिव एन रविशंकर ने भी शासन स्तर पर अधिकारियों की बैठक ली और जिलाधिकारियों से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बात की। मुख्य सचिव ने तैयारी का भी जायजा लिया।
उत्तराखंड में मानसून ने दस्तक दे दी है। राज्य मौसम विभाग ने उत्तराखंड में मानसून की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही मौसम विभाग राज्य में दो दिन भारी बारिश की चेतावनी भी दी है।
खुशनुमा है यहां का मौसम उत्तराखण्ड "पौड़ी गढ़वाल"
"पौड़ी गढ़वाल" खुशनुमा है यहां का मौसम उत्तराखण्ड
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पर्वतों की हसीन वादियों में अनेक ऐसे स्थान हैं, जो पर्यटन की दृष्टि से भले ही खास पहचान नहीं बना पाए, लेकिन वहां व्याप्त नैसर्गिक छटा और सुरम्यता घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों को आकर्षित करती है। ऐसी ही एक जगह है ‘पौड़ी’। यह छोटा सा पर्वतीय शहर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का मुख्यालय है। कण्डोलिया हिल्स पर स्थित इस स्थान की समुद्रतल से औसत उंचाई 5950 फुट है। इस लिहाज से पौड़ी को इस मौसम का हिल स्टेशन भी कहा जा सकता है। प्रचलित हिल स्टेशनों की भीड़भाड़ से ऊबने के बाद यदि किसी शांत स्थल की तलाश हो तो पौड़ी एक आदर्श डेस्टिनेशन माना जाएगा। मजे की बात यह है कि यह एक बजट डेस्टिनेशन भी है। क्योंकि यहां कोई बड़ा या स्टार होटल नहीं है। यहां घूमने के अधिकतर पाइंट नेचर वॉक के रूप में पैदल घूमते हुए ही देखे जा सकते हैं।
वैसे तो अंग्रेजों के समय से ही यह स्थान विकसित हो चुका था लेकिन यहां उस दौर के कुछ बंगले ही मौजूद हैं। इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कई स्थानों से हिमालयन स्नो-रेंज को बिना किसी बाधा के निहारा जा सकता है। पौड़ी दर्शन की शुरुआत कंडोलिया देवता मंदिर से की जा सकती है। घने जंगल के मध्य स्थित यह मंदिर मालरोड से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर है। मंदिर के मार्ग में और उसके आसपास बांज, बुरास के फूलों की छटा तथा चीड़ और देवदार की हरियाली सैलानियों का मन मोह लेती है। यह मार्ग ऐसा है कि मिनी जंगल सफारी का आनंद आ जाता है। मंदिर के निकट विकसित पार्क में विश्राम किया जा सकता है। जहां बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं। वहां से बर्फ से ढकी पर्वतचोटियों के नजारे भी देखने को मिलते हैं। पर्वतीय गांवों की सादगी देखनी हो तो वहीं से बूबाखाल नामक एक पहाड़ी गांव तक जाया जा सकता है। लगभग 4 किमी दूर इस स्थान से सीढ़ीनुमा खेतों के दृश्य बहुत सुंदर दिखते हैं।
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पर्वतों की हसीन वादियों में अनेक ऐसे स्थान हैं, जो पर्यटन की दृष्टि से भले ही खास पहचान नहीं बना पाए, लेकिन वहां व्याप्त नैसर्गिक छटा और सुरम्यता घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों को आकर्षित करती है। ऐसी ही एक जगह है ‘पौड़ी’। यह छोटा सा पर्वतीय शहर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का मुख्यालय है। कण्डोलिया हिल्स पर स्थित इस स्थान की समुद्रतल से औसत उंचाई 5950 फुट है। इस लिहाज से पौड़ी को इस मौसम का हिल स्टेशन भी कहा जा सकता है। प्रचलित हिल स्टेशनों की भीड़भाड़ से ऊबने के बाद यदि किसी शांत स्थल की तलाश हो तो पौड़ी एक आदर्श डेस्टिनेशन माना जाएगा। मजे की बात यह है कि यह एक बजट डेस्टिनेशन भी है। क्योंकि यहां कोई बड़ा या स्टार होटल नहीं है। यहां घूमने के अधिकतर पाइंट नेचर वॉक के रूप में पैदल घूमते हुए ही देखे जा सकते हैं।
वैसे तो अंग्रेजों के समय से ही यह स्थान विकसित हो चुका था लेकिन यहां उस दौर के कुछ बंगले ही मौजूद हैं। इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कई स्थानों से हिमालयन स्नो-रेंज को बिना किसी बाधा के निहारा जा सकता है। पौड़ी दर्शन की शुरुआत कंडोलिया देवता मंदिर से की जा सकती है। घने जंगल के मध्य स्थित यह मंदिर मालरोड से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर है। मंदिर के मार्ग में और उसके आसपास बांज, बुरास के फूलों की छटा तथा चीड़ और देवदार की हरियाली सैलानियों का मन मोह लेती है। यह मार्ग ऐसा है कि मिनी जंगल सफारी का आनंद आ जाता है। मंदिर के निकट विकसित पार्क में विश्राम किया जा सकता है। जहां बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं। वहां से बर्फ से ढकी पर्वतचोटियों के नजारे भी देखने को मिलते हैं। पर्वतीय गांवों की सादगी देखनी हो तो वहीं से बूबाखाल नामक एक पहाड़ी गांव तक जाया जा सकता है। लगभग 4 किमी दूर इस स्थान से सीढ़ीनुमा खेतों के दृश्य बहुत सुंदर दिखते हैं।
कंडोलिया के दूसरी ओर रांसी नामक जगह है। करीब 7000 फुट की उंचाई पर स्थित रांसी में उत्तराखंड का सबसे ऊंचा स्टेडियम है। स्टेडियम के चारों ओर वृक्षों की कतारें इसे अनोखा सौन्दर्य और शीतलता प्रदान करती हैं। रांसी से एक मार्ग किंकालेश्वर मंदिर की ओर जाता है। 8वीं शताब्दी में बना यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में पावन शिवलिंग और उसके सामने नंदी की मूर्ति अवस्थित है। मंदिर के विशाल परिसर से भी हिमालय के हिमशिखरों का दृश्य देखते ही बनता है। द्वारीखाल फारेस्ट की ओर जाएं तो करीब साढ़े तीन किलोमीटर दूर ‘चौखम्बा व्यू पाइंट’ है। जहां से चौखम्बा पीक ही नहीं कई अन्य पीक भी स्पष्ट दिखाई देती हैं। वहीं कुछ दूर द्वारीखाल फारेस्ट में जंगल वाक का आनंद ले सकते हैं। वहां एक छोटा सा झरना भी है।
पहाड़ को जीवन देते जलस्रोत
पहाड़ को जीवन देते जलस्रोत
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मानव जीवन में जल स्रोतों की अहमियत की बात की जाए तो पहाड़ में जलस्रोत जंगल के बीच खेतों की बीच, चट्टानों के बीच या फिर आबादी के बीच भी दिखाई देती हैं। पहाड़ के जलस्रोतों के संवर्धन की बात करें तो यहां हर जंगल में अनेक जलस्रोत प्राकृतिक रूप से दिखाई देते, आज वहां जलस्रोत को छोड़ नौले, चुपट्यौव, पोखर कुछ भी नहीं दिखाई देते। जहां कभी एक सूद के बराबर पानी रिसकर जाता दिखाई देता, तो लोग उसे चुपट्यौव (लगभग एक से डेढ़ लीटर पानी एकत्रित किया हुआ गड्ढा) बनाकर उस जगह को जल स्रोत के रूप में रेखांकित कर देते थे। यदि चुपट्यौव से ज्यादा पानी दिखाई देता तो जलमानस उसे पोखर बनाते। जहां पर बण(जानवरों के चरागाह) से वापसी करते वक्त जानवर इससे अपनी प्यास बुझाते थे। बरसात में यह पोखर बिल्कुल छोटी सी सुरम्य झील दिखाई देती थी। इसी प्रकार पोखर से भी अधिक जलराशि दिखाई पड़ने पर मानव उसे नौले का आकर्षक रूप प्रदान किया करता जहां सतह पर कच्छा गड्ढा खोद दिया जाता। वहीं धीरे-धीरे ुपर की ओर वर्गाकार अथवा आयताकार रूप देकर ऊंचाई वाले नौले का निर्माण किया जाता, जिससे चारों और केवल चपटे पाथरों की चिनाई किए जाने उसकी ऊपरी सतह पर सीढ़ियां बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती। अंत में इसके चारों ओर की दीवारों को उठाकर चारों तरफ से पानी भरने के लिए मोवनुमा (दरवाजे की सी आकृति) आकृति छोड़ दी जाती थी।
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मानव जीवन में जल स्रोतों की अहमियत की बात की जाए तो पहाड़ में जलस्रोत जंगल के बीच खेतों की बीच, चट्टानों के बीच या फिर आबादी के बीच भी दिखाई देती हैं। पहाड़ के जलस्रोतों के संवर्धन की बात करें तो यहां हर जंगल में अनेक जलस्रोत प्राकृतिक रूप से दिखाई देते, आज वहां जलस्रोत को छोड़ नौले, चुपट्यौव, पोखर कुछ भी नहीं दिखाई देते। जहां कभी एक सूद के बराबर पानी रिसकर जाता दिखाई देता, तो लोग उसे चुपट्यौव (लगभग एक से डेढ़ लीटर पानी एकत्रित किया हुआ गड्ढा) बनाकर उस जगह को जल स्रोत के रूप में रेखांकित कर देते थे। यदि चुपट्यौव से ज्यादा पानी दिखाई देता तो जलमानस उसे पोखर बनाते। जहां पर बण(जानवरों के चरागाह) से वापसी करते वक्त जानवर इससे अपनी प्यास बुझाते थे। बरसात में यह पोखर बिल्कुल छोटी सी सुरम्य झील दिखाई देती थी। इसी प्रकार पोखर से भी अधिक जलराशि दिखाई पड़ने पर मानव उसे नौले का आकर्षक रूप प्रदान किया करता जहां सतह पर कच्छा गड्ढा खोद दिया जाता। वहीं धीरे-धीरे ुपर की ओर वर्गाकार अथवा आयताकार रूप देकर ऊंचाई वाले नौले का निर्माण किया जाता, जिससे चारों और केवल चपटे पाथरों की चिनाई किए जाने उसकी ऊपरी सतह पर सीढ़ियां बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती। अंत में इसके चारों ओर की दीवारों को उठाकर चारों तरफ से पानी भरने के लिए मोवनुमा (दरवाजे की सी आकृति) आकृति छोड़ दी जाती थी।
Tuesday, 23 June 2015
Monday, 22 June 2015
Sunday, 21 June 2015
डांडा नागराजा मंदिर (पौड़ी) उत्तराखण्ड
डांडा नागराजा मंदिर (पौड़ी) उत्तराखण्ड
- गढ़वाल क्षेत्र मे मान्यतानुसार भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है.
- यहां के मुख्य आकर्षण में संगम के अलावा एक शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैं
- जिनमें रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है.
- देवप्रयाग प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण है.
- यहां का सौन्दर्य अद्वितीय है.
- इसके निकट डांडा नागराज मंदिर और चंद्रबदनी मंदिर भी दर्शनीय हैं.
- देवप्रयाग को 'सुदर्शन क्षेत्र' भी कहा जाता है.
- यहां कौवे दिखायी नहीं देते,
- जो की एक आश्चर्य की बात है.
Saturday, 20 June 2015
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