कहीं गुम न हो जाए गौरेया, बचा लीजिए
========================
कुछ
साल पहले की ही तो बात है, घर के आंगन और छत पर अनाज के दाने पड़े हों तो
पता नहीं कहां से सैकड़ों गौरेया का झुंड पलभर में आ जाता था।
सुबह से शाम तक इनकी चहचहाहट से आंगन गुलजार रहता था। लेकिन अब.....। यह प्रश्न आते ही ऐसी रिक्तता आती है, जिसे भरना होगा। गौरेया कई स्थानों से लगभग गायब हो चुकी है या फिर बहुत कम हो चुकी है। जिन स्थानों पर फिलहाल यह दिखाई देती हैं वहां भी इनकी संख्या घटती जा रही है।
गौरेया जंगल या पेड़ पर घौंसला बनाकर नहीं रहती। यह मानव की मित्र है और इसे मानव के साथ उसके घर में रहना अच्छा लगता है। इसलिए आइए एक ऐसे घर, ऐसे माहौल का निर्माण करें जिसमें हम, हमारा परिवार और उस परिवार के सदस्य के तौर पर गौरेया भी रहे।
गौरेया के संरक्षण के लिए जनजागरण जरूरी है। अमर उजाला की ओर से आज से यह मुहिम शुरू की जा रही है। गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता एवं पक्षी संवाद प्रयोगशाला के साथ मिलकर गौरेया के संरक्षण के लिए धरातल पर काम करेंगे। इसमें आपके सहयोग के बिना कुछ संभव नहीं है।
इस तरह घट रही इनकी संख्या
गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता एवं पक्षी संवाद प्रयोगशाला के आंकड़ों के मुताबिक हरिद्वार शहर में विगत पांच-छह वर्षों में गौरेया की संख्या 50 फीसदी घट गई है। जहां पहले गौरेया पक्षी 50 तक के झुंड में दिख जाते थे वहां अब इनका झुंड में 10-12 गौरेया रहे गई हैं।
प्रयोगशाला की ओर से उत्तराखंड के हल्द्वानी, पंतनगर और उत्तर प्रदेश के बिजनौर, हापुड़, गाजियाबाद, शाहदरा जैसे शहरों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि इन स्थानों पर भी गौरेया के झुंड 4-16 की संख्या में सिमटकर रह गए हैं।
संख्या घटने के यह कारण
गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता एवं पक्षी संवाद प्रयोगशाला में अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक प्रो. दिनेश भट्ट और डा. विनय कुमार सेठी की ओर से गौरेया को लेकर बहुत काम किया जा रहा है।
डॉ. विनय कुमार सेठी ने विश्व के जाने-माने विशेषज्ञ डॉ. डेनिस समर स्मिथ का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने लैड रहित ईंधन को भी गौरेया की घटती संख्या के लिए जिम्मेदार माना है। इसके दहन से कई ऐसे विषैले सह उत्पाद निकलते हैं जो छोटे कीड़ों को मार देते हैं। जब इन कीटों को गौरेया स्वयं खाती है या फिर अपने बच्चों को खिलाती है तो उन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
आलीशान मकान भी जिम्मेदार
शहरों में आलीशान मकान बनाने के चक्कर में हमने गौरेया के घर उजाड़ दिए हैं। पहले घरों में आले, ईंटों के बीच जगह, कच्ची छत में जगह आदि स्थानों पर गौरेया घौंसला बना लेती थी लेकिन अब हम गौरेया को घर में प्रवेश और घौंसला बनाने की जगह नहीं देते।
खेतों में कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग भी गौरेया के लिए घातक हो रहा है। गौरेया मुख्य रूप से अनाज खाने वाला पक्षी है। कीटनाशकों के उपयोग से अनाज के विषाक्त होने की संभावना ज्यादा रहती है। इससे इनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है।
सुबह से शाम तक इनकी चहचहाहट से आंगन गुलजार रहता था। लेकिन अब.....। यह प्रश्न आते ही ऐसी रिक्तता आती है, जिसे भरना होगा। गौरेया कई स्थानों से लगभग गायब हो चुकी है या फिर बहुत कम हो चुकी है। जिन स्थानों पर फिलहाल यह दिखाई देती हैं वहां भी इनकी संख्या घटती जा रही है।
गौरेया जंगल या पेड़ पर घौंसला बनाकर नहीं रहती। यह मानव की मित्र है और इसे मानव के साथ उसके घर में रहना अच्छा लगता है। इसलिए आइए एक ऐसे घर, ऐसे माहौल का निर्माण करें जिसमें हम, हमारा परिवार और उस परिवार के सदस्य के तौर पर गौरेया भी रहे।
गौरेया के संरक्षण के लिए जनजागरण जरूरी है। अमर उजाला की ओर से आज से यह मुहिम शुरू की जा रही है। गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता एवं पक्षी संवाद प्रयोगशाला के साथ मिलकर गौरेया के संरक्षण के लिए धरातल पर काम करेंगे। इसमें आपके सहयोग के बिना कुछ संभव नहीं है।
इस तरह घट रही इनकी संख्या
गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता एवं पक्षी संवाद प्रयोगशाला के आंकड़ों के मुताबिक हरिद्वार शहर में विगत पांच-छह वर्षों में गौरेया की संख्या 50 फीसदी घट गई है। जहां पहले गौरेया पक्षी 50 तक के झुंड में दिख जाते थे वहां अब इनका झुंड में 10-12 गौरेया रहे गई हैं।
प्रयोगशाला की ओर से उत्तराखंड के हल्द्वानी, पंतनगर और उत्तर प्रदेश के बिजनौर, हापुड़, गाजियाबाद, शाहदरा जैसे शहरों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि इन स्थानों पर भी गौरेया के झुंड 4-16 की संख्या में सिमटकर रह गए हैं।
संख्या घटने के यह कारण
गुरुकुल कांगड़ी विवि की पक्षी विविधता एवं पक्षी संवाद प्रयोगशाला में अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक प्रो. दिनेश भट्ट और डा. विनय कुमार सेठी की ओर से गौरेया को लेकर बहुत काम किया जा रहा है।
डॉ. विनय कुमार सेठी ने विश्व के जाने-माने विशेषज्ञ डॉ. डेनिस समर स्मिथ का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने लैड रहित ईंधन को भी गौरेया की घटती संख्या के लिए जिम्मेदार माना है। इसके दहन से कई ऐसे विषैले सह उत्पाद निकलते हैं जो छोटे कीड़ों को मार देते हैं। जब इन कीटों को गौरेया स्वयं खाती है या फिर अपने बच्चों को खिलाती है तो उन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
आलीशान मकान भी जिम्मेदार
शहरों में आलीशान मकान बनाने के चक्कर में हमने गौरेया के घर उजाड़ दिए हैं। पहले घरों में आले, ईंटों के बीच जगह, कच्ची छत में जगह आदि स्थानों पर गौरेया घौंसला बना लेती थी लेकिन अब हम गौरेया को घर में प्रवेश और घौंसला बनाने की जगह नहीं देते।
खेतों में कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग भी गौरेया के लिए घातक हो रहा है। गौरेया मुख्य रूप से अनाज खाने वाला पक्षी है। कीटनाशकों के उपयोग से अनाज के विषाक्त होने की संभावना ज्यादा रहती है। इससे इनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है।

No comments:
Post a Comment