"पौड़ी गढ़वाल" खुशनुमा है यहां का मौसम उत्तराखण्ड
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पर्वतों की हसीन वादियों में अनेक ऐसे स्थान हैं, जो पर्यटन की दृष्टि से भले ही खास पहचान नहीं बना पाए, लेकिन वहां व्याप्त नैसर्गिक छटा और सुरम्यता घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों को आकर्षित करती है। ऐसी ही एक जगह है ‘पौड़ी’। यह छोटा सा पर्वतीय शहर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का मुख्यालय है। कण्डोलिया हिल्स पर स्थित इस स्थान की समुद्रतल से औसत उंचाई 5950 फुट है। इस लिहाज से पौड़ी को इस मौसम का हिल स्टेशन भी कहा जा सकता है। प्रचलित हिल स्टेशनों की भीड़भाड़ से ऊबने के बाद यदि किसी शांत स्थल की तलाश हो तो पौड़ी एक आदर्श डेस्टिनेशन माना जाएगा। मजे की बात यह है कि यह एक बजट डेस्टिनेशन भी है। क्योंकि यहां कोई बड़ा या स्टार होटल नहीं है। यहां घूमने के अधिकतर पाइंट नेचर वॉक के रूप में पैदल घूमते हुए ही देखे जा सकते हैं।
वैसे तो अंग्रेजों के समय से ही यह स्थान विकसित हो चुका था लेकिन यहां उस दौर के कुछ बंगले ही मौजूद हैं। इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कई स्थानों से हिमालयन स्नो-रेंज को बिना किसी बाधा के निहारा जा सकता है। पौड़ी दर्शन की शुरुआत कंडोलिया देवता मंदिर से की जा सकती है। घने जंगल के मध्य स्थित यह मंदिर मालरोड से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर है। मंदिर के मार्ग में और उसके आसपास बांज, बुरास के फूलों की छटा तथा चीड़ और देवदार की हरियाली सैलानियों का मन मोह लेती है। यह मार्ग ऐसा है कि मिनी जंगल सफारी का आनंद आ जाता है। मंदिर के निकट विकसित पार्क में विश्राम किया जा सकता है। जहां बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं। वहां से बर्फ से ढकी पर्वतचोटियों के नजारे भी देखने को मिलते हैं। पर्वतीय गांवों की सादगी देखनी हो तो वहीं से बूबाखाल नामक एक पहाड़ी गांव तक जाया जा सकता है। लगभग 4 किमी दूर इस स्थान से सीढ़ीनुमा खेतों के दृश्य बहुत सुंदर दिखते हैं।
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पर्वतों की हसीन वादियों में अनेक ऐसे स्थान हैं, जो पर्यटन की दृष्टि से भले ही खास पहचान नहीं बना पाए, लेकिन वहां व्याप्त नैसर्गिक छटा और सुरम्यता घुमक्कड़ी के शौकीन लोगों को आकर्षित करती है। ऐसी ही एक जगह है ‘पौड़ी’। यह छोटा सा पर्वतीय शहर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का मुख्यालय है। कण्डोलिया हिल्स पर स्थित इस स्थान की समुद्रतल से औसत उंचाई 5950 फुट है। इस लिहाज से पौड़ी को इस मौसम का हिल स्टेशन भी कहा जा सकता है। प्रचलित हिल स्टेशनों की भीड़भाड़ से ऊबने के बाद यदि किसी शांत स्थल की तलाश हो तो पौड़ी एक आदर्श डेस्टिनेशन माना जाएगा। मजे की बात यह है कि यह एक बजट डेस्टिनेशन भी है। क्योंकि यहां कोई बड़ा या स्टार होटल नहीं है। यहां घूमने के अधिकतर पाइंट नेचर वॉक के रूप में पैदल घूमते हुए ही देखे जा सकते हैं।
वैसे तो अंग्रेजों के समय से ही यह स्थान विकसित हो चुका था लेकिन यहां उस दौर के कुछ बंगले ही मौजूद हैं। इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां कई स्थानों से हिमालयन स्नो-रेंज को बिना किसी बाधा के निहारा जा सकता है। पौड़ी दर्शन की शुरुआत कंडोलिया देवता मंदिर से की जा सकती है। घने जंगल के मध्य स्थित यह मंदिर मालरोड से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर है। मंदिर के मार्ग में और उसके आसपास बांज, बुरास के फूलों की छटा तथा चीड़ और देवदार की हरियाली सैलानियों का मन मोह लेती है। यह मार्ग ऐसा है कि मिनी जंगल सफारी का आनंद आ जाता है। मंदिर के निकट विकसित पार्क में विश्राम किया जा सकता है। जहां बच्चों के लिए झूले भी लगे हैं। वहां से बर्फ से ढकी पर्वतचोटियों के नजारे भी देखने को मिलते हैं। पर्वतीय गांवों की सादगी देखनी हो तो वहीं से बूबाखाल नामक एक पहाड़ी गांव तक जाया जा सकता है। लगभग 4 किमी दूर इस स्थान से सीढ़ीनुमा खेतों के दृश्य बहुत सुंदर दिखते हैं।
कंडोलिया के दूसरी ओर रांसी नामक जगह है। करीब 7000 फुट की उंचाई पर स्थित रांसी में उत्तराखंड का सबसे ऊंचा स्टेडियम है। स्टेडियम के चारों ओर वृक्षों की कतारें इसे अनोखा सौन्दर्य और शीतलता प्रदान करती हैं। रांसी से एक मार्ग किंकालेश्वर मंदिर की ओर जाता है। 8वीं शताब्दी में बना यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में पावन शिवलिंग और उसके सामने नंदी की मूर्ति अवस्थित है। मंदिर के विशाल परिसर से भी हिमालय के हिमशिखरों का दृश्य देखते ही बनता है। द्वारीखाल फारेस्ट की ओर जाएं तो करीब साढ़े तीन किलोमीटर दूर ‘चौखम्बा व्यू पाइंट’ है। जहां से चौखम्बा पीक ही नहीं कई अन्य पीक भी स्पष्ट दिखाई देती हैं। वहीं कुछ दूर द्वारीखाल फारेस्ट में जंगल वाक का आनंद ले सकते हैं। वहां एक छोटा सा झरना भी है।


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